यथा नाम तथा गुण की मूर्तिमति प्रतिमा: महा सती,संथारा साधिका श्री कीर्तियशा जी महाराज सा*
05/09/2026
*यथा नाम तथा गुण की मूर्तिमति प्रतिमा: महा सती,संथारा साधिका श्री कीर्तियशा जी महाराज सा*
पथ प्रदर्शक पूर्वाचार्यों तथा वर्तमान में उभय भगवन्तों की प्रेरक प्रेरणा से हमारा यह साधुमार्गी संघ सदा जयवंत रहा है और भविष्य में भी रहने की पूर्ण संभावना है।
संघ की मुक्तमाला का एक एक मोती बेशकीमती है।इसी कड़ी में हम बात करते हैं संथारा साधिका पूज्य श्री कीर्तियशा जी महाराज सा की:
71 वर्ष की आयु में दीक्षा लेकर महासती जी ने यह प्रमाणित कर दिया कि आत्म जागृति के लिए आयु नहीं बल्कि अंतर की पुकार आवश्यक होती है।
महासती जी का तप हमें सिखाता है कि जीवन की संध्या भी मोक्ष का प्रभात बन सकती है।उनका आचरण,श्रद्धा,साहस,आत्म बल और समर्पण का जीवंत शास्त्र है जो युगों युगों तक साधकों को दिशा देता रहेगा।
यथा नाम तथा गुण की मूर्तिमति प्रतिमा:
महासती जी कीर्ति यशा जी महान।
कीर्ति और यश से दैदीप्यमान जिनका तप,
आलोकित राम गुरु का विधान।
संथारे की समाधि साधना में लीन,
विरक्ति विभा से शोभित जीवन।
मानो तप,त्याग और संयम का साकार हुआ हो,
पावन साधन।
जिनकी रत्न कुक्षी से उदित हुए संयम सूर्य:श्री राकेश मुनि और चिन्मय मुनि महान।
जिनकी तप ज्योति से आलोकित हुआ श्री संघ और जिन शासन का मान।
पुत्रियां : समीक्षणा श्री,सरिश्मा श्री, करिश्मा श्री,
संयम सुवास बिखेर रहीं।
त्याग,तप और आराधना से राम शासन की कीर्ति निखेर रहीं।
पोती राम जयणा श्री तप दीप बन,
दादी के आदर्शों को जग में फैलातीं।
दोहिती अणिमा श्री भी विराग-पथ पर,
जिनवाणी की महिमा गाती।।
धन्य वह वीर माता,वीर दादी,वीर नानी का जीवन व्रत।
जिनके कुल में संयम-सरिता
बहती,
जिनशासन होता नित्य समृद्ध।।
राम गुरु के,साधुमार्ग के इस गौरवमय शासन में,
अमर रहेगी यह पुण्य कथा।
"वीना" कीर्तियशा महासती की तप-गाथा सदा गाएगा,
श्रद्धामय ये संघ सदा।।
क्षीण देह में भी अचल वैराग्य,नयन में करुणा और मुख मंडल पर अद्भुत शांति विराजमान थी।
हर क्षण संयम का घोष और हर मौन में साधना के संगीत की सुमधुर स्वर-लहरियां गुंजायमान थीं।
यह 66 दिवस का दीर्घ संथारा केवल मात्र देह विसर्जन नहीं अपितु आत्मा के शिखरारोहण की अप्रतिम अलौकिक, अनूठी,अविस्मरणीय गाथा है।।
यह साधना,न शुष्क तप थी,न विरक्ति मात्र बल्कि यह तो चेतना का मोक्ष की ओर सशक्त प्रस्थान था।
रतलाम की पुण्य धरा धन्य हुई,संयम का वैभव साकार हुआ,गुरु नेश्राय में संथारा स्वयं साध्य हुआ।
हे अरिहंत! इस तप वंदना को स्वीकार करो और हमें भी संयम की ऐसी ही दृढ़ता प्रदान करो।।
नमो संथाराय!नमो संयमाय!!
नमो मोक्षमार्गाय!!!
*वीना नाहर,ब्यावर*
