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सुदीर्घ संथारा:राजमार्ग पर बढ़ाये कदम*  *साध्वी कीर्तियशाजी को शत्- शत् नमन*  प्रतिभा तिलराज सहलोत निम्बाहेड़ा

सुदीर्घ संथारा:राजमार्ग पर बढ़ाये कदम* *साध्वी कीर्तियशाजी को शत्- शत् नमन* प्रतिभा तिलराज सहलोत निम्बाहेड़ा

*सुदीर्घ संथारा:राजमार्ग पर बढ़ाये कदम* *साध्वी कीर्तियशाजी को शत्- शत् नमन* सिंघी कुल में फूल खिला, बोथरा परिवार में पुष्पित हुआ, तप संयम की सुरभि से राम बगिया को सुवासित कर गया। जीवन का रहस्य समझा, संयम लिया, संथारा ठाया और उच्च भावों में रमण कर आत्मा को ऊर्ध्वगामी बनाया। आपकी श्रद्धा, भक्ति, समर्पणा बेजोड़ है। माता मदालसा का आदर्श उपस्थित करते हुए अपनी स्नेह रश्मियों से ममता सींच अध्यात्म का मार्ग दिखाया और गुरु चरणों में समर्पित कर दिया। आपके अंगजात 7 प्रसून रामेश छत्र छाया में आनंदित हो रहे हैं। संथारे के दौरान आपके दर्शनों के साथ ही सुखद साये में बैठ गुणाराधना का अवसर मिला। आपके शांत प्रशांत चेहरे को देख मन श्रद्धा से अभिभूत हो गया। संथारे से कुछदिनों पूर्व भी, जब मैं रतलाम दर्शन के लिए गई थी तब रात्रि में, अन्य महासतियां जी और मैं गुरु गुणगान कर रहे थे तब आप भीतर से हमारे मध्य पधार गए और मस्ती भरे भावों और मुक्त कंठ से "तेरे बिना गुरुवर हमारा नहीं कोई रे" स्तवन प्रस्तुत किया। वो स्वर आज भी स्मृति में गूंज रहे हैं। प्रभु महावीर ने कहा कि देह तो कभी भी नष्ट होगी लेकिन देहातीत चेतना अमर है। आपका गुणमय जीवन सदा जीवंत रहेगा। आपने वीरतापूर्वक पंडित मरण प्राप्त किया, मृत्यु को महोत्सव बनाया, 66 दिन की भीषण परीक्षा में उत्तीर्णता प्राप्त की। मैं हृदय के कण कण से भावांजलि अर्पित करते हुए शासनदेव से प्रार्थना करती हूं कि आप अविलंब अपने मोक्ष लक्ष्य को प्राप्त करें, और हम पर आशीष वर्षण करें कि हम भी आपके अनुगामी बनें। प्रतिभा तिलकराज सहलोत, निम्बाहेड़ा
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