आचार्य श्री पादलिप्तसूरिजी महाराज साहेब
10/07/2025
आचार्य श्री पादलिप्तसूरिजी महाराज साहेब
इनका जन्म अयोध्या नगरी में हुआ था। इनके पिता का नाम फुल्लचंद्र और माता का नाम प्रतिमा था। संग्रामसिंहसूरिजी इनके दीक्षादाता, नागहस्तीसूरिजी इनके दीक्षा गुरु एवं मण्डनसूरिजी इनके शिक्षा गुरु थे।
इनका प्रथम नाम मुनि नागेन्द्र था किंतु अपने गुरु नागहस्ती से पादलेप - विद्या ग्रहण की, जिसके प्रभाव से पैरों में औषधियों का लेप लगाकर गगन में विचरण करने की असाधारण क्षमता के धनी हो गए एवं फलस्वरूप 'पादलिप्त' के नाम से प्रसिद्ध हुए। उनके पास मंत्र और तंत्र की विशिष्ट चामत्कारिक शक्तियाँ थी। उनके मूत्र से पत्थर भी सोना बन सके ऐसी शक्तियाँ उनमें थी।
8 वर्ष की उम्र में दीक्षा लेकर 10 वर्ष की आयु में वे आचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए जो उनकी प्रखर योग्यता का सूचक है। मंत्र विद्या का प्रयोग कर पादलिप्तसूरिजी ने पाटण के राजा मुरुण्ड को, मानखेट के राजा कृष्ण को , ओंकारपुर के राजा भीम को , प्रतिष्ठानपुर के राजा शातवाहन आदि को प्रभावित कर धर्मप्रचार में उन्हें सहयोगी बनाया। उनकी कवित्व शक्ति भी अनुपम थी। वे अपने युग के विश्रुत विद्वान थे। दस हजार पद्ययुक्त गंभीर कृति - तरंगवती कथा, दीक्षा एवं प्रतिष्ठा विषयक कृति निर्वाणकलिका तथा ज्योतिष विषयक कृति - प्रश्नप्रकाश आदि ग्रंथ उनकी अमूल्य देन है।
पादलिप्तसूरिजी ने शत्रुंजय पर महावीर स्वामी जी की प्रतिमा प्रतिष्ठित की। प्रभु प्रतिमा के समक्ष उन्होंने 2 पद्यों में प्रभु स्तुति की। उन पद्यों में सुवर्ण सिद्धि व गगनगामिनी विद्या का में संकेत थे, जो आज भी गुप्त ही है। योगविद्यासिद्ध आचार्य पादलिप्तसूरिजी 32 दिनों के अनशन से शत्रुंजय गिरिराज पर स्वर्ग सिधाये। उनका समय वीर निर्वाण की छठ्ठी सातवीं शताब्दी रहा। उनके शिष्य नागार्जुन ने गुरुभक्ति निमित्ते पादलिप्तसूरिजी के नाम पर शत्रुजय तीर्थ की तलहटी पर 'पादलिप्तपुर' नामक नगर बसाया जो बाद में 'पालीताणा' कहलाया जाने लगा।
संकलन - देवलोक जिनालय पालिताणा
